• Sujeet Sir

Poem - मेरा नाम कहाँ है ?


For the audio recitation of this poem click here https://youtu.be/-fJVd_0c08k


यूं कहने को तो पन्नो पर,

मुझसे ये सारा जहाँ है।

पर मेरा नाम कहाँ है ?


क्या घूँघट में क्या बुर्के में ,

क्या फर्क मैं हूँ किस फ़िरक़े मे।

सबने एक जैसा हाल किया

जब भी कुछ पूछा, टाल दिया।


मेरी हस्ती, मेरा वज़ूद नहीं ,

मैं होकर भी मौजूद नहीं।

मैं ज़िंदा हूँ बेजान नहीं,

फिर भी मेरी पहचान नही।


जब मैं ही हूँ जो जनती है

फिर किस से छुपकर रहती है ?

मेरी हस्ती सबको खलती है,

इसमें मेरी क्या गलती है?


मैं मुंह भी छुपाकर जीती हूँ ,

चुपचाप ये ज़िल्लत सहती हूँ ।

फिर भी मर्दो में सब्र नहीं ,

मेरी अस्मत की कोई कद्र नहीं।


मैं क्यूं गुमनाम जीये जाऊं ?

घुट घुट ये ज़हर पीये जाऊं।

सालता है ये दर्द मुझे,

वहशी लगता हर मर्द मुझे।


मेरे अपने हक़ की लड़ाई में,

कोई भी अपना साथ नहीं।

बेनाम मेरे रहने में क्या

मेरे अपनों का भी हाथ नहीं ?


मुझे अपने नाम से जीना है,

अपनी पहचान बनानी है।

मेरी हस्ती बस किरदार नहीं ,

मेरी अपनी भी कहानी है।


अब कितना और सहुँ मैं भी ,

कब तक चुपचाप रहू मैं भी।

ताउम्र मुझे क्यों सब्र रहे ?

बेनाम मेरी क्यों कब्र रहे?


यूं कहने को तो पन्नो पर,

मुझसे ये सारा जहाँ है।

पर मेरा नाम कहाँ है ?


For the audio recitation of this poem click here https://youtu.be/-fJVd_0c08k

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